(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.67. अध्यायः 067
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
सुभद्रया श्रीकृष्णंप्रति तन्महिमसंस्तवनपूर्वकं परिक्षिदुज्जीवनप्रार्थना॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

उत्थितायां पृथायां तु सुभद्रा भ्रातरं तदा।
दृष्ट्वा चुक्रोश दुःखार्ता वचनं चेदमब्रवीत्॥ 14-67-1(94353)
पुण्डरीकाक्ष पश्य त्वं पौत्रं पार्थस्य धीमतः।
परिक्षीणेषु कुरुषु परिक्षीणां गतायुषम्॥ 14-67-2(94354)
इषीका द्रोणपुत्रेणि भीमसेनार्थमुद्यता।
सोत्तरायां निपतिता विजये मयि चैव ह॥ 14-67-3(94355)
सेयं ज्वलन्ती हृदये मयि तिष्टति केशव।
यन्न पश्यामि दुर्धर्ष सहपुत्रं तु तं प्रभो॥ 14-67-4(94356)
किंनु वक्ष्यति धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः।
भीमसेनार्जुनौ चापि माद्रवत्याः सुतौ च तौ॥ 14-67-5(94357)
श्रुत्वाऽभिमन्योस्तनयं जातं च मृतमेव च।
मुषिता इव वार्ष्णेय द्रोणपुत्रेण पाण्डवाः॥ 14-67-6(94358)
अभिमन्युः प्रियः कृष्ण पितॄणां नात्र संशयः।
ते श्रुत्वा किंनु वक्ष्यन्ति द्रोणपुत्रास्त्रनिर्जिताः॥ 14-67-7(94359)
भविता नः परं दुःखं किंनु मन्ये जनार्दन।
अभिमन्योः सुतं कृष्ण मृतं जातमरिंदम॥ 14-67-8(94360)
साऽहं प्रसादये कृष्ण त्वामद्य शिरसा नता।
पृथेयं द्रौपदी चैव ताः पश्य पुरुषोत्तम॥ 14-67-9(94361)
यदा द्रोणसुतो गर्भान्पाण्डूनां हन्ति माधव।
तदा किल त्वया द्रौणिः क्रुद्धेनोक्तोऽरिमर्दन॥ 14-67-10(94362)
अकामं त्वां करिष्यामि ब्रह्मबन्धो नराधम।
अहं संजीवयिष्यामि किरीटितनयात्मजम्॥ 14-67-11(94363)
इत्येद्वचनं श्रुत्वा जानानाऽहं बलं तव।
प्रसादये त्वां दुर्धर्ष जीवतामभिमन्युजः॥ 14-67-12(94364)
यद्येतत्त्वं प्रतिश्रुत्य न करोषि वच शुभम्।
सकलं वृष्णिशार्दूल मृतां मामवधारय॥ 14-67-13(94365)
अभिमन्योः सुतो वीर न संजीवति यद्ययम्।
जीवति त्वयि दुर्धर्ष किं करिष्याम्यहं त्वया॥ 14-67-14(94366)
संजीवयैनं दुर्धर्ष मृतं त्वमभिमन्युजम्।
सदृशाक्षसुतं वीर सस्यं वर्षन्निवांम्बुदः॥ 14-67-15(94367)
त्वं हि केशव धर्मात्मा सत्यवान्सत्यविक्रमः।
स तां वाचमृतां कर्तुमर्हसि त्वमरिंदम॥ 14-67-16(94368)
इच्छन्नपि हि लोकांस्त्रीञ्जीवयेथा मृतानिमान्।
किं पुनर्दयितं जातं स्वस्रीयस्यात्मजं मृतम्॥ 14-67-17(94369)
प्रभावज्ञाऽस्मि ते कृष्ण तस्मात्त्वां याचयाम्यहम्।
कुरुष्व पाण्डुपुत्राणामिमं परमनुग्रहम्॥ 14-67-18(94370)
स्वसेति वा महाबाहो हतपुत्रेति वा पुनः।
प्रपन्ना मामियं चेति दयां कर्तुमिहार्हसि॥ ॥ 14-67-19(94371)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वि सप्तषष्टितमोऽध्यायः॥ 67 ॥

Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Footnotes
7-67-4 घृतेन सिक्तैरिति शेषः॥


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